हद्द हो गई अब तो, जैसे हर जगह आरक्षण की वजह से जनरल केटागिरी वाले अपने ही देश मैं दोयम दर्जे के नागरिक बन गये हैं वैसे ही डेल्ही मेट्रो मैं दिल्ली या युवा दोयम दर्जे का पेसेंजर बन गया हैं एक तो महिलाओ के लिए पूरा डब्बा आरक्षित हैं दूसरा बाकी हर सीटो पर 2 सीट आरक्षित हैं और उनमें से 2 सीट वरिष्ट नागरिक और वृद्धो, और विकलांगो के लिए आरक्षित हैं जो बाक़ी बची सीट हैं वो युवा वर्ग के लिए है पर ये आरक्षित सीट और डब्बा भर जाये तो सबकी नज़र ( महिला, वृद्धो, विकलांगो, और वरिष्ठ नागरिक ) उन युवाओं पर टिक जाती हैं फिर क्या करें सम्मान वश उसे वहां से भी उठाना पड़ता हैं, अगर उठने का मन ना हो तो गर्दन नीचे झुका के बैठना पड़ता हैं उसपर भी मन मैं ग्लानि तो होती ही हैं अब क्या करें युवा इस पर कुछ पंक्तिया ---
अबला युवा तेरी यही कहानी, आखों मैं शर्म, बर्बाद है जवानी !
ना नोकरी है झोली मैं,और छोकरी की तरफ देखना भी हुई बात पुरानी ..!
कोई जगह नही है अब तेरी यहाँ, दिशा हीन है तेरी जिंदगानी।
...........................हाय ..! अबला युवा तेरी यही कहानी ;) ;) --- अंतर्यामी बाबा
